Love, Emotional, Traditional & Friendship SHAYARI

February 20, 2011

हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफताब आहिस्ता-आहिस्ता

जवान होने लगे जब वो तो हम से कर लिया परदा
हया यक लख्त आईइ और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता

शब-ए-फुरक़त का जागा हूँ फरिश्तो अब तो सोने दो
कॅभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को उदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता-आहिस्ता

वो बेदर्दी से सर काटें और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

चाहता है दिल किसी का दिल चुराकर देखना

चाहता है दिल किसी का दिल चुराकर देखना,,
खुद तड़पना रात भर उसको सताकर देखना,,,

में फरिश्ता तो नही हू कुछ बहक ही जाऊँगा,,
देखिएगा फिर ना मुझको मुस्कुराकर देखना,,

 

दूरिया नज़दीकियो मेी भी बदल सकती हे ये,,
तुम किसी को प्यार से अपना बना कर देखना,,

एक ही शब काटना फुरकत की “फरहत” और फिर,,
अपनी सूरत से मेरी सूरत मिलकर देखना….!!!!

February 6, 2011

वो बदगुमान है तो सौ बार आज़माए मुझे

ये मोजाज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे

के सुंग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे

वो मेहेरबाँ है तो इकरार क्यू नही करता

वो बदगुमान है तो सौ बार आज़माए मुझे

वो मेरा इश्क है सारे जहाँ को है मालूम

दगा करे जो किसीसे तो शर्म आए मुझे

जाने कौन सी मजबूरी है यह की तुम हर बात छुपाते हो

कभी साथ देते हो तो काभ हाथ छुड़ाते हो,

जाने कौन सी मजबूरी है यह की तुम हर बात छुपाते हो,

अपनी तो हसरत है यह की तुमहरा प्यार पाना

मगर तुम हो जो की बस अपना गुम छुपाते हो,

यह तन्हाई का ही कसूर है,

नये रिश्तो से हाथ क्यों छुड़ाते हो,

इन बातो का मैं क्या करू,

की एक पल हसते हो तो दूसरे पल रुलाते हो,

कभी खामोश रहते हो कभी फिर मुस्कुराते हो,

जाने-अंजाने मे तुम ना जाने कितने चेहरे दिखाते हो,

अपनी खातिर तुमने अपने-आप को खोया है,

खोने के बाद मुझे ढूँढ लाने को कहते हो,

कभी साथ देते हो तो कभी हाथ छुड़ाते हो,

जाने कौन सी मजबूरी है यह की उम हर बात छुपाते हो .

January 20, 2011

दोस्ती भी तो निभाई ना गयी, दुश्मनी मे भी अदावत ना हुई

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई

जिसको चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उस से मोहब्बत ना हुई

जिस से जब तक मिले दिल ही से मिले, दिल जो बदला तो फसाना बदला

रस्मे दुनिया की निभाने के लिए हमसे रिश्तो की तिजारत ना हुई

दूर से था वो कई चेहरो मे, पास से कोई भी वैसा ना लगा

बे-वफाइ भी उसी का था चलन, फिर किसीसे शिकायत ना हुई

वक़्त रूठा रहा बच्चे की तरह, राह मे कोई खिलोना ना मिला

दोस्ती भी तो निभाई ना गयी, दुश्मनी मे भी अदावत ना हुई

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