खाक में मेरी हस्ती मिला कर गया

यार जो भी मिला दिल जला कर गया
खाक में मेरी हस्ती मिला कर गया

प्यास जिसकी सदा मैं बुझाता रहा
जहर-ए-कातिल मुझे वो पिला कर गया

नाज़ उसकी वफ़ा पर मुझे था मगर
तीर वो भी जिगर पर चला कर गया

तलाश करता था कभी जो मुझे हर गली
नज़र वो आज मुझसे बचा कर गया

मानता था सहारा जो हरदम मुझे
बेसहारा मुझे वो बना कर गया

नींद आगोश में जिसकी आने लगी
मौत की नींद मुझ को सुला कर गया

आरज़ू थी “यारो” किसी की मुझे,
ख्वाब मेरे वही तो मिटा कर गया

ऐसा भी कोइ है के सब अच्छा कहे जिसे

आईना क्यू ना दूं के तमाशा कहे जिसे
ऐसा कहा से लाउ के तुझसा कहे जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बाज़म-ए-ख़याल मे
गुलदस्ता-ए-निगाह सुवेदा कहे जिसे

फूँका है किसने गोशे मोहब्बत में आए खुदा
अफसुन-ए-इंतज़ार तमन्ना कहे जिसे

सर पर हजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए
वो एक मुश्त-ए-खाक के सहारा कहे जिसे

है चश्म-ए-तार मे हसरत-ए-दीदार से निहा
शौक़-ए-ईना गुसेख्ता दरिया कहे जिसे

दरकार है शिगुफ्तन-ए-गुल हए ऐश को
सब_ह-ए-बहार पबा-ए-मिना कहे जिसे

ग़ालिब” बुरा ना मान जो वैज बुरा कहे
ऐसा भी कोइ है के सब अच्छा कहे जिसे

कोई अपना अब मिल जो गया है

हम मदहोश हुवे जा रहे थे
जैसे जैसे वो करीब आ रहे थे

लगा जैसे पल थम सा गया है
कोई अपना अब मिल जो गया है ..

ठंडी फुहार जैसे कुछ कह रही थी..
चांदनी जब उसके केशों को छु बह रही थी..

रात में भी सुन्हेरी धुप खिल आई थी…
सितारों की महफ़िल मैं रौशनी नयी आई थी…

उसकी अदाओं से सितारें भी मदहोश हो रहे थे..
चाँद शर्मा रहा था और वक़्त खामोश हो रहा था..

उस पल हर लम्हा थम जाना चाहता था..
उन्हें देखने चाँद भी ज़मीन पे आना चाहता था..

क्या है जिंदगी?

क्या है जिंदगी? सावन की रिमझिम या इठलाती धुप

फूलो का गुलशन चिडियों का गीत या झरनों की सरगम,

होली के रंग प्रीतम का संग बिरहा की बेला या पहला मिलन

पहली बरसात तारो भरी रात या  पूनम का चाँद

माँ की लोरी, बाबुल का प्यार या हाथो की मेहंदी,

 योवन का सृंगार, क्या कहूँ क्या है जिंदगी, 

साँसों की रवानी, बचपन की शरारत या जवानी

रास्तो की धुल या कामयाबी की उड़ान

क्या नाम दूं क्या कहू की क्या है जिंदगी ?

हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफताब आहिस्ता-आहिस्ता

जवान होने लगे जब वो तो हम से कर लिया परदा
हया यक लख्त आईइ और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता

शब-ए-फुरक़त का जागा हूँ फरिश्तो अब तो सोने दो
कॅभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को उदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता-आहिस्ता

वो बेदर्दी से सर काटें और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

चाहता है दिल किसी का दिल चुराकर देखना

चाहता है दिल किसी का दिल चुराकर देखना,,
खुद तड़पना रात भर उसको सताकर देखना,,,

में फरिश्ता तो नही हू कुछ बहक ही जाऊँगा,,
देखिएगा फिर ना मुझको मुस्कुराकर देखना,,

 

दूरिया नज़दीकियो मेी भी बदल सकती हे ये,,
तुम किसी को प्यार से अपना बना कर देखना,,

एक ही शब काटना फुरकत की “फरहत” और फिर,,
अपनी सूरत से मेरी सूरत मिलकर देखना….!!!!

वो बदगुमान है तो सौ बार आज़माए मुझे

ये मोजाज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे

के सुंग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे

वो मेहेरबाँ है तो इकरार क्यू नही करता

वो बदगुमान है तो सौ बार आज़माए मुझे

वो मेरा इश्क है सारे जहाँ को है मालूम

दगा करे जो किसीसे तो शर्म आए मुझे