कुछ अपने शहर से

शहर गोरखपुर, गुरु गोरखनाथ और गौतम बुध के पद कमलो से पावन धरती है यहा की. गुरु गोरखनाथ को समर्पित गोरखनाथ मंदिर निश्चय ही मनोरम दर्शनिय स्थल है |
गीता प्रेस जैसी जग प्रसिध संस्था का केंद्र है गोरखपुर, मुंशी प्रेमचंद और फिराक़ गोरखपुरी जैसे साहित्यकारो की जन्मस्थली है गोरखपुर, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जैसे संगीतकार भी यही पैदा हुए| राम प्रसाद बिस्मिल जी ने यही अपनी आज़ादी की लड़ाई को विराम देकर फाँसी के फंदे को हंसते हुए गले लगाया था| महापण्डित राहुल सांस्कृत्यायन और क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे महापुरुषो ने इस शहर को एक अलग पहचान दी है|

और बहुत कुछ है इस शहर के बारे मे लिखने को पर वो सब  अगली मुलाक़ात मे

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जो रुख़ मोड़ दे हवा का तो फिर नज़र क्या है

वो मेरा हमदम नही तो फिर दिल-ए-बसर क्या है
जो रुख़ मोड़ दे हवा का तो फिर नज़र क्या है

दिल-ए-बेताब की दवा है उसकी एक मुस्कुराहट
ना पूछ उसकी गलियो मे जाने का सबब क्या है

खाक में मेरी हस्ती मिला कर गया

यार जो भी मिला दिल जला कर गया
खाक में मेरी हस्ती मिला कर गया

प्यास जिसकी सदा मैं बुझाता रहा
जहर-ए-कातिल मुझे वो पिला कर गया

नाज़ उसकी वफ़ा पर मुझे था मगर
तीर वो भी जिगर पर चला कर गया

तलाश करता था कभी जो मुझे हर गली
नज़र वो आज मुझसे बचा कर गया

मानता था सहारा जो हरदम मुझे
बेसहारा मुझे वो बना कर गया

नींद आगोश में जिसकी आने लगी
मौत की नींद मुझ को सुला कर गया

आरज़ू थी “यारो” किसी की मुझे,
ख्वाब मेरे वही तो मिटा कर गया

किसी से प्यार अगर हो तो बेपनाह ना हो

मोहब्बातों में अगर कोई रस्म ओ राह ना हो
सुकून तबाह ना हो, ज़िंदगी गुनाह ना हो

कुछ अएतेदाल भी लाज़िम है दिल लगी के लिए
किसी से प्यार अगर हो तो बेपनाह ना हो

इस एहतेयात से मैं तेरे साथ चलता हूँ
तेरी निगाह से आगे मेरी निगाह ना हो

मेरा वजूद है सचाईयों का आईना
यह और बात के मेरा कोई गवाह ना हो

ऐसा भी कोइ है के सब अच्छा कहे जिसे

आईना क्यू ना दूं के तमाशा कहे जिसे
ऐसा कहा से लाउ के तुझसा कहे जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बाज़म-ए-ख़याल मे
गुलदस्ता-ए-निगाह सुवेदा कहे जिसे

फूँका है किसने गोशे मोहब्बत में आए खुदा
अफसुन-ए-इंतज़ार तमन्ना कहे जिसे

सर पर हजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिए
वो एक मुश्त-ए-खाक के सहारा कहे जिसे

है चश्म-ए-तार मे हसरत-ए-दीदार से निहा
शौक़-ए-ईना गुसेख्ता दरिया कहे जिसे

दरकार है शिगुफ्तन-ए-गुल हए ऐश को
सब_ह-ए-बहार पबा-ए-मिना कहे जिसे

ग़ालिब” बुरा ना मान जो वैज बुरा कहे
ऐसा भी कोइ है के सब अच्छा कहे जिसे

कोई अपना अब मिल जो गया है

हम मदहोश हुवे जा रहे थे
जैसे जैसे वो करीब आ रहे थे

लगा जैसे पल थम सा गया है
कोई अपना अब मिल जो गया है ..

ठंडी फुहार जैसे कुछ कह रही थी..
चांदनी जब उसके केशों को छु बह रही थी..

रात में भी सुन्हेरी धुप खिल आई थी…
सितारों की महफ़िल मैं रौशनी नयी आई थी…

उसकी अदाओं से सितारें भी मदहोश हो रहे थे..
चाँद शर्मा रहा था और वक़्त खामोश हो रहा था..

उस पल हर लम्हा थम जाना चाहता था..
उन्हें देखने चाँद भी ज़मीन पे आना चाहता था..