रोयेंगे हम हजार बार

दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त दर्द से भर न आये क्यों ?
रोयेंगे हम हजार बार, कोइ हमें सताए क्यों ?

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों ?

हाँ वो नहीं खुदा-परस्त, जाओ वो बे-वफ़ा सही
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये क्यों ?

‘गालिब’-ए-खस्ता के बीगेर कौन से काम बंद हैं ?
रोइए झार-झार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों ?

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